ग़म-ए-ज़िंदगी: फ़ुरकान एस ख़ान की दिल छू लेने वाली उदास ग़ज़ल
फ़ुरकान एस ख़ान की यह ग़ज़ल ज़िंदगी के गहरे दुख और तन्हाई को बयां करती है। सुकून की तलाश और बेकसी का दर्द इसमें झलकता है।
सुकून: शांति, चैन चाहत: प्रेम, इच्छा कारवाँ: काफिला, समूह हमसफ़र: साथी अश्कों: आँसुओं दरिया: नदी शब-ओ-रोज़: रात और दिन बेकसी: लाचारी, बेबसी ग़म: दुख बेज़ुबान: खामोश, जिसे व्यक्त न किया जा सके
लबों: होंठों सदियों: बहुत लंबे समय मंज़िल: लक्ष्य, गंतव्य अजनबी: अनजान व्यक्ति दर-ब-दर: दर-दर, हर जगह कली: फूल की कली (यहाँ प्रेम के अंकुर से तात्पर्य) बेबसी: लाचारी तकमील: पूर्णता, पूरा होना
अश्कों: आँसुओं रोकना: रोकना, थामना सँवरना: सँवरना, ठीक होना संभलना: खुद को संभालना बहलना: मन बहलाना, शांत होना घना: गहरा, सघन टटोलना: खोजना, याद करना
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