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क्रोध पर मार्मिक ग़ज़ल: भीतर की आग और अहंकार का अंत

क्रोध की आग पर एक मार्मिक ग़ज़ल। जानिए कैसे क्रोध और अहंकार इंसान को भीतर से जला देते हैं। Furkan S Khan की कलम से एक भावनात्मक रचना।

Friday, September 25, 2026
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क्रोध पर मार्मिक ग़ज़ल: भीतर की आग और अहंकार का अंत
“क्रोध पर मार्मिक ग़ज़ल: भीतर की आग और अहंकार का अंत”
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25 September 2026
क्रोध पर मार्मिक ग़ज़ल: भीतर की आग और अहंकार का अंत
ग़ज़ल
भीतर ही भीतर एक तप्त दबा है, बाहर से शांत दिखूँ पर मन में कोहराम मचा है। लफ्जों की तपिश से मैंने खुद को ही जला है, वो ज़हर जो अपनों की बातों से निकला और खला है। इस के बोझ तले वक्त भी थमा है, नफरत की राहों पर अब मेरा ही काफिला चला है।
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Kaafiya दबा, जला, खला, चला Radeef है
F Poetry ByFurkan S Khan

यह ग़ज़ल मानवीय क्रोध की उस अवस्था को दर्शाती है जो बाहर से शांत दिखती है परंतु भीतर ही भीतर व्यक्ति को राख कर देती है। 'ज्वाला' शब्द क्रोध की तीव्रता का प्रतीक है, जबकि 'अहंकार' उस अहंकार को दर्शाता है जो हमें दूसरों से दूर और खुद को विनाश के करीब ले जाता है। क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो जलाने वाले को ही पहले भस्म करती है। इस कविता का उद्देश्य यह समझाना है कि क्रोध का परिणाम केवल पछतावा होता है। यह रचना उन लोगों के लिए है जो अपने भीतर दबे हुए आक्रोश को शब्दों के माध्यम से मुक्ति देना चाहते हैं।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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