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बे-करार दिल: जुदाई का दर्द - एक ग़ज़ल

फ़ुरक़ान एस ख़ान की यह ग़ज़ल टूटे दिल के दर्द, इंतज़ार की बेबसी और तन्हाई के इक़रार को बयाँ करती है। गहन भावनाओं से भरी यह शायरी हर दिल को छू लेगी।

Thursday, September 24, 2026
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बे-करार दिल: जुदाई का दर्द - एक ग़ज़ल
“बे-करार दिल: जुदाई का दर्द - एक ग़ज़ल”
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24 September 2026
बे-करार दिल: जुदाई का दर्द - एक ग़ज़ल
ग़ज़ल
दिल को मेरे, कहाँ से मिले करार [शांति] क्या करें। हर साँस में है दर्द, हम इंतज़ार क्या करें। वो गए ऐसे, जैसे कभी थे ही नहीं। इस वीरान [उजाड़] ज़िंदगी में, अब बहार क्या करें। न कोई साथ है अब, न कोई आसरा [सहारा] है। इस तन्हाई का, अब हम इक़रार [स्वीकार] क्या करें।
Kaafiya करार, इंतज़ार, बहार, इक़रार Radeef क्या करें
F Poetry ByFurkan S Khan
ग़ज़ल
जो था कभी अपना, वो आज मुझसे दूर हो गया। हर ख्वाब मेरा, आँखों से यूँ ही चूर हो गया। वो साथ तेरा, इक था, जो नज़र आया। मैं टूट के भी, फिर से मजबूर हो गया। क्या कहें इस दिल की को, जो जलती रही। हर साँस मेरी, बस तेरा ही नूर [प्रकाश] हो गया।
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Kaafiya दूर, चूर, मजबूर, नूर Radeef हो गया
F Poetry ByFurkan S Khan

यह ग़ज़ल 'बे-करार दिल' उस गहरी पीड़ा और बेचैनी को दर्शाती है जो दिल टूटने के बाद महसूस होती है। शायर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहता है कि जब दिल में शांति न हो तो इंतज़ार करना भी व्यर्थ है। महबूब के चले जाने से ज़िंदगी वीरान हो गई है, और अब उसमें कोई खुशी या बहार नहीं बची। आखिरी शेर में, कवि उस कड़वी सच्चाई को स्वीकार करता है कि अब कोई सहारा नहीं बचा और इस तन्हाई को अपनाना ही एकमात्र रास्ता है। यह ग़ज़ल जुदाई के दर्द, बेबसी और अंततः अकेलेपन को स्वीकार करने की मार्मिक कहानी है, जो हर टूटे हुए दिल की आवाज़ बन जाती है।

यह ग़ज़ल 'अनकही दास्तान' अधूरे प्यार और बेवफाई के गहरे ज़ख्म को शब्दों में पिरोती है। शायर उस रिश्ते की बात करता है जो कभी अपना था, पर अब दूर हो चुका है, और जिसके साथ देखे गए सारे ख्वाब बिखर चुके हैं। दूसरे शेर में, कवि उस धोखे का ज़िक्र करता है जिसने उसे भीतर से तोड़ दिया, फिर भी वह उसी याद में मजबूर होकर जी रहा है। आखिरी शेर में, दिल की अनकही इच्छाओं और महबूब की अनुपस्थिति में भी उसकी यादों के प्रकाश में जीने की बात कही गई है। यह ग़ज़ल खोए हुए प्यार, छल और उस दर्दनाक मजबूरी की कहानी है जो दिल टूटने के बाद भी किसी की यादों से बाहर नहीं निकल पाती।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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