दर्द-ए-फ़ुरक़त: फ़ुरक़ान एस ख़ान की उदास ग़ज़ल

फ़ुरक़ान एस ख़ान द्वारा रचित एक मार्मिक ग़ज़ल जो जुदाई, दर्द और गहन उदासी के एहसास को बयाँ करती है। दिल को छू लेने वाले बोल।

Thursday, August 27, 2026
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दर्द-ए-फ़ुरक़त: फ़ुरक़ान एस ख़ान की उदास ग़ज़ल
“दर्द-ए-फ़ुरक़त: फ़ुरक़ान एस ख़ान की उदास ग़ज़ल”
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27 August 2026
दर्द-ए-फ़ुरक़त: फ़ुरक़ान एस ख़ान की उदास ग़ज़ल
Ghazal
ये कैसा दर्द है जो अब सहा नहीं जाता, ग़म-ए-फ़ुरक़त का ज़हर अब पिया नहीं जाता। तेरी यादों में मेरा दिल कहीं रहा नहीं जाता, जो कहना था तुझसे अब वो कहा नहीं जाता। मेरी आँखों से अश्कों का दरिया बहा नहीं जाता, क्यूँ दिल का ये हाल तुझसे कहा नहीं जाता। हर पल ये तन्हाई का आलम है सहा नहीं जाता, फ़ुरक़त का ये मौसम क्यूँ गुज़रा नहीं जाता।
Kaafiya सहा, पिया, रहा, कहा, बहा, गुज़रा Radeef नहीं जाता
F Poetry ByFurkan S Khan
Ghazal
जो दिल में है दर्द, किसे मैं बताऊँ क्या करूँ, हर रात अश्कों से अपनी प्यास बुझाऊँ क्या करूँ। जो खो गया सुकून, उसे कहाँ से पाऊँ क्या करूँ, ख़ामोश लबों से अपनी दास्तान सुनाऊँ क्या करूँ। हर याद तेरी आग सी है जो जलाऊँ क्या करूँ, इस बुझती शमा को मैं फिर से जलाऊँ क्या करूँ। ये ज़िंदगी का सफ़र है, अब कैसे निभाऊँ क्या करूँ, हर साँस में जो घुटन है, उसे कहाँ छुपाऊँ क्या करूँ।
Kaafiya बताऊँ, बुझाऊँ, पाऊँ, सुनाऊँ, जलाऊँ, निभाऊँ, छुपाऊँ Radeef क्या करूँ
F Poetry ByFurkan S Khan

दर्द-ए-फ़ुरक़त

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: सहा, पिया, रहा, कहा, बहा, गुज़रा  |  Radeef: नहीं जाता
ये कैसा दर्द है जो अब सहा नहीं जाता, ग़म-ए-फ़ुरक़त का ज़हर अब पिया नहीं जाता। तेरी यादों में मेरा दिल कहीं रहा नहीं जाता, जो कहना था तुझसे अब वो कहा नहीं जाता। मेरी आँखों से अश्कों का दरिया बहा नहीं जाता, क्यूँ दिल का ये हाल तुझसे कहा नहीं जाता। हर पल ये तन्हाई का आलम है सहा नहीं जाता, फ़ुरक़त का ये मौसम क्यूँ गुज़रा नहीं जाता।

Ghazal — By Furkan S Khan

Kaafiya: बताऊँ, बुझाऊँ, पाऊँ, सुनाऊँ, जलाऊँ, निभाऊँ, छुपाऊँ  |  Radeef: क्या करूँ
जो दिल में है दर्द, किसे मैं बताऊँ क्या करूँ, हर रात अश्कों से अपनी प्यास बुझाऊँ क्या करूँ। जो खो गया सुकून, उसे कहाँ से पाऊँ क्या करूँ, ख़ामोश लबों से अपनी दास्तान सुनाऊँ क्या करूँ। हर याद तेरी आग सी है जो जलाऊँ क्या करूँ, इस बुझती शमा को मैं फिर से जलाऊँ क्या करूँ। ये ज़िंदगी का सफ़र है, अब कैसे निभाऊँ क्या करूँ, हर साँस में जो घुटन है, उसे कहाँ छुपाऊँ क्या करूँ।

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Zainab Khatoon
लेखक

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