उदासी पर एक मार्मिक क़िता: अकेलेपन की आह - फरकान एस खान
फरकान एस खान द्वारा रचित 'अकेलेपन की आह' एक मार्मिक क़िता है जो उदासी, दर्द और अकेलेपन की गहराइयों को दर्शाती है।
रात भर जागना, दिल को सताना है,
किसको ये दर्द अपना बताना है।
हर ख़ुशी दूर हुई, गम का ठिकाना है,
अब तो बस आँसुओं को बहाना है।
Kaafiya सताना, बताना, ठिकाना, बहाना
Radeef है
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Poetry ByFurkan S Khan
लबों पे हँसी, मगर दिल में है मातम, क्या करें हम?
कोई समझे न इस दर्द का मौसम, क्या करें हम?
अश्कों में ढली हर रात का आलम, क्या करें हम?
बस चुपचाप सहते हैं ये सारे सितम, क्या करें हम?
Kaafiya मातम, मौसम, आलम, सितम
Radeef क्या करें हम?
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Poetry ByFurkan S Khan
जब से टूटे हैं ख़्वाब सारे,
दिल में बस गए हैं अँधेरे।
रोशनी की किरणें भी अब नहीं घेरे,
बस उदासी के साये हैं मेरे।
Kaafiya सारे, अँधेरे, घेरे, मेरे
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Poetry ByFurkan S Khan
अकेलेपन की आह
Qita — By Furkan S Khan
Kaafiya: सताना, बताना, ठिकाना, बहाना | Radeef: है
रात भर जागना, दिल को सताना है,
किसको ये दर्द अपना बताना है।
हर ख़ुशी दूर हुई, गम का ठिकाना है,
अब तो बस आँसुओं को बहाना है।
Qita — By Furkan S Khan
Kaafiya: मातम, मौसम, आलम, सितम | Radeef: क्या करें हम?
लबों पे हँसी, मगर दिल में है मातम, क्या करें हम?
कोई समझे न इस दर्द का मौसम, क्या करें हम?
अश्कों में ढली हर रात का आलम, क्या करें हम?
बस चुपचाप सहते हैं ये सारे सितम, क्या करें हम?
Qita — By Furkan S Khan
Kaafiya: सारे, अँधेरे, घेरे, मेरे
जब से टूटे हैं ख़्वाब सारे,
दिल में बस गए हैं अँधेरे।
रोशनी की किरणें भी अब नहीं घेरे,
बस उदासी के साये हैं मेरे।
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